
BRICS जल्द ही अगली चाल चलकर गोल्ड स्टैंडर्ड पर लौट सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका को इस संगठन से USD को होने वाले खतरे को कम नहीं आंकना चाहिए। हम वैश्विक रिज़र्व करेंसी के रूप में अमेरिकी डॉलर का दौर खत्म होते देख सकते हैं।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में BRICS देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका) ने धीमी प्रगति दिखाई है, लेकिन अब यह संगठन अगला कदम उठाने की स्थिति में है। इसका क्या मतलब है? विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिकी डॉलर पर एक और बड़ा हमला हो सकता है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से दुनिया की रिज़र्व करेंसी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हो सकता है।
वे क्या करने वाले हैं? उम्मीद है कि BRICS देश गोल्ड से समर्थित एक नई करेंसी पेश करेंगे। आसान शब्दों में कहें, तो वे गोल्ड स्टैंडर्ड को फिर से लाना चाहते हैं। अगला कदम इस अगस्त में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान उठाया जा सकता है।



संभव है कि दुनिया को इस बात का अंदाज़ा मिल जाए कि नई मुद्रा कैसी हो सकती है। कुछ अनुमानों के अनुसार, BRICS देश 2030 के अंत तक सोने के समर्थन वाली पूरी तरह विकसित मुद्रा पेश कर सकते हैं। संगठन ने G7 देशों का मुकाबला करने के लिए मज़बूत तंत्र विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। इसके प्रतिनिधि और सचिव दुनिया भर में आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों, खेल, शिक्षा आदि में मौजूद हैं।
इसके अलावा, BRICS समूह लगातार विस्तार कर रहा है। अधिक से अधिक विकासशील देश इस “क्लब” में शामिल होने के इच्छुक हैं। अगले कुछ वर्षों में इस संगठन का और विस्तार होगा और इसमें खाड़ी देश भी शामिल होंगे।
इन सभी घटनाक्रमों से डॉलर के इस्तेमाल में कमी का रुझान और मज़बूत हो रहा है। कुछ सेक्टर पहले ही अमेरिकी डॉलर से दूरी बना रहे हैं। उदाहरण के लिए, एनर्जी ट्रेडिंग अमेरिकी डॉलर के उलट दिशा में आगे बढ़ रही है। इन सबके अहम भू-राजनीतिक असर हो सकते हैं।
नतीजतन, अब ऊर्जा बाज़ार में कारोबार डॉलर में होता नहीं दिखेगा। अगर ऐसा हुआ, तो बैंकों को मुख्य रिज़र्व करेंसी के तौर पर USD रखने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
आपकी ट्रेडिंग किस्मत आपका साथ दे!